Roohi Movie Review: ऐसी हॉरर कॉमेडी जो हंसाती है लेकिन डराती नहीं

कोरोना महामारी और लॉकडाउन के बाद जब बॉलीवुड की पहली बड़ी फ़िल्म ‘रूही’ रिलीज़ हुयी तो दर्शक खुद को सिनेमा घर में जाने से नहीं रोक पा रहे हैं। लेकिन अधिकांश लोग मेरी तरह निराश ही लौट रहे है, क्योंकि ये फ़िल्म आपके मनोरंजन की प्यास को बुझाने और उम्मीदों पर ख़रा उतरने में बिलकुल नाकामयाब साबित होती है। इसमें दोष है निर्माताओं का जिन्होंने इसके प्रमोशन में ‘स्त्री’ फ़िल्म का सहारा लिया और यहाँ तक की टैग लाइन भी मिलती झूलती रखी – मर्द को दर्द होगा (फ़िल्म स्त्री) और मर्द को ज्यादा दर्द होगा (फ़िल्म रूही)। बस यही प्रमोशनल स्ट्रेटेजी इस फ़िल्म को ले डूबी, क्योंकि दर्शक ‘स्त्री’ की यादों के साथ थिएटर में घुसते है लेकिन ये ‘रूही’ ना तो उन यादों को ताज़ा कर पाती है और ना ही अपनी एक अलग छाप छोड़ पाती है। ऐसा नहीं है कि फ़िल्म बिलकुल ही बेकार है, बस प्रमोशन के जरिये जिस मनोरंजन का वादा निर्माताओं ने दर्शको से किया, उसे ये फ़िल्म पूरा नहीं कर पाती।

2018 में राजकुमार राव और श्रद्धा कपूर की फ़िल्म स्त्री की सफ़लता से बॉलीवुड को हॉरर कॉमेडी के कांसेप्ट से नयी उम्मीद जगी। लेकिन इस फिल्म की कहानी में वो दम ही नहीं है जो इसे एक यादगार हॉरर कॉमेडी बना सके। हॉरर और कॉमेडी के बिच तालमेल बैठाने के चक्कर में लेखक, निर्माता और निर्देशक ऐसे फंसे कि ‘रूही’ ऐसी खिचड़ी बन कर रह गयी है कि जिसका स्वाद कुछ खास नहीं है, लेकिन अगर आप खा ले तो नुक्सान भी कुछ नहीं है। फ़िल्म के सबसे मज़बूत स्तम्भ है इसके कलाकार, लोकेशन और निकिता कपूर का मेकअप जिन्होंने जान्हवी कपूर को बहुत ही डरावना रूप दिया है। कलाकारों की बात करें तो भंवरा के किरदार में नज़र आये राजकुमार राव अपने अलग अंदाज़ से समां बांधते है। एक वो ही है इस फ़िल्म में जिनके हॉरर और कॉमेडी दोनों की टाइमिंग सही से मैच हो पायी है। मानव विज और सरिता जोशी जैसे मंझे हुए कलाकारों ने अपने किरदारों को बखूबी निभाया है।

अब बात करते है उन दो किरदारों और कलाकारों की जिनकी वजह से इस फ़िल्म की गाडी पटरी से उतर गयी। कट्टनी के रोल में नज़र आये वरुण शर्मा जिनकी सभी तारीफ़ कर रहे है और मुझे नहीं समझ आ रहा है कि आखिर क्यों? निर्माता ये बात भूल ही गए कि ये फ़िल्म ‘रूही’ है ना कि ‘फुकरे’। किरदार को गढ़ते समय कट्टनी और चूचा में कोई फ़र्क ही नहीं छोड़ा। लेकिन फुकरे के मनचले चूचा का एक धाकड़ लेडी डॉन भोली पंजाबन से इश्क हो जाना समझ आता है, लेकिन कट्टनी का एक डरावनी ‘मुड़िया पैरी’ चुड़ैल के इश्क़ में पड़ जाना हज़म ही नहीं होता। फ़िल्म में अगर लव ट्रायंगल दिखाना ही था तो भंवरा और कट्टनी दोनों को ही रूही की मासूमियत और भोलेपन की वजह से इश्क़ हो जाना दिखाया जा सकता था। लेकिन कट्टनी के मुड़िया पैरी चुड़ैल अफ़ज़ा से प्यार हो जाना फ़िल्म में कॉमेडी का ऐसा तड़का लगाता है कि जो हॉरर सीन का भी मज़ा ख़राब कर देता है।

जान्हवी कपूर का चुड़ैल वाला रूप इतना खतरनाक है कि वाकई उससे डर लगता है, लेकिन कट्टनी और अफ़ज़ा के बिच केमिस्ट्री दिखाने के चक्कर में उस डरवाने रूप से ही डर ख़त्म हो जाता है। हॉरर फ़िल्मों में जब अचानक कोई डरवाना सीन आता है तो दर्शक अपनी सीट से उछल जाते है। जैसे कंजूरिंग 2 में जब वलक स्क्रीन पर आती है तो कलेजा मुंह को आ जाता है और रोंगटे खड़े कर देता है। जान्हवी कपूर के अफ़ज़ा वाले रूप में भी इतना ही पोटेंशियल है, लेकिन फ़िल्म का एक किरदार उससे डरने की बजाये इश्क लड़ा रहा हो तो कोई क्यों डरेगा? डरवाने रूप में अफ़ज़ा के हॉरर सीन कम और कॉमेडी सीन ज्यादा है, जिनमें कट्टनी उसे पटाने की कोशिश करता रहता है।

जान्हवी कपूर की बात करें तो उन्होंने मासूम लड़की रूही और मुड़िया पैरी चुड़ैल अफ़ज़ा दोनों ही किरदार बिलकुल सही तरीके से निभाए है। लेकिन यहाँ मुझे चिंता इस बात की है कि कहीं जान्हवी भी फ़िल्मों के चयन को ले कर वही गलतियां कर रही है जो एशा देओल ने अपनी करियर की शुरुआत में की थी और उसी की वजह से उम्दा अभिनय करने की क्षमता के बावजूद उनका करियर डूब गया था। इस फ़िल्म में जान्हवी के लिए अभिनय करने के लिए ज्यादा स्कोप नहीं है, लेकिन जितना भी मौका उन्हें मिला उन्होंने फ़िल्म दर फ़िल्म निखरते अपने अभिनय से दर्शकों को लुभाया है। जहाँ एक तरफ रूही की मासूमियत दर्शकों के दिल को छूती है, तो दूसरी तरफ अफ़ज़ा के रूप में पहली झलक दिल दहला देती है। ‘नदियां पार’ गाने में जान्हवी श्रीदेवी की याद दिला देती है, लेकिन जान्हवी को अगर श्रीदेवी बनना है तो सही फ़िल्मों का चयन करना बहुत ही जरुरी है, जिनमें वो अपने अभिनय की छाप छोड़ सके।

अंत में यही कहूँगा कि ये फ़िल्म कहने को तो हॉरर कॉमेडी है लेकिन ना ज्यादा हँसाती पाती है और ना ही डरा पाती है। लेकिन मेरी तरह थिएटर जा कर फ़िल्म देखने के लिए तरस रहे है तो ‘रूही’ देखने जा सकते है, टाइमपास अच्छा हो जायेगा।

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