Bihar Election Results: जनता द्वारा नेतृत्व में बदलाव के संकेत को क्यों नज़रअंदाज़ कर रही है कांग्रेस?

पहले दिल्ली, महाराष्ट्र और अब बिहार चुनाव परिणामो (Bihar Election Results) ने संकेत दिए है कि जनता भाजपा (BJP) का विकल्प ढूंढ रही है, लेकिन कांग्रेस (Congress) के नेतृत्व पर विश्वास नहीं करना चाहती। महाराष्ट्र में शिवसेना (Shivsena), दिल्ली में आम आदमी पार्टी (Aam Aadmi party) और अब बिहार में तेजस्वी यादव (Tejasvi Yadav) के नेतृत्व में आरजेडी (RJP) को जिस तरह से जनता ने सिर माथे पर बैठाया, ये खतरे की घंटी का संकेत है, भाजपा और कांग्रेस दोनों ही पार्टियों के लिए। एक तरफ तो जनता भाजपा का विकल्प ढूंढ रही है और दूसरी तरफ उन्होंने अपने मतदान की शक्ति से स्पष्ट कर दिया है कि उनका कांग्रेस के नेतृत्व पर से विश्वास उठ चूका है। भाजपा के पास तो फिर भी मोदी और शाह जैसे नेता है जो वोटर्स को आकर्षित और प्रभावित करने का दम रखते है लेकिन कांग्रेस के पास ऐसा चेहरा ही नहीं है जिस पर जनता विश्वास कर सके। या यूँ भी कहा जा सकता है कि कांग्रेस प्रभावी नेताओं को अवसर ही नहीं दे रही है।

ज्योतिरादित्य सिंधिया (Jyotiraditya Scindia) जैसे प्रभावशाली युवा नेता का इस तरह कांग्रेस छोड़ कर भाजपा में शामिल होना और दिग्गज़ नेता सचिन पायलट (Sachin Pilot) को मानाने की बजाए पॉवरलेस कर देना कांग्रेस की गलत रणनीतियों के उदाहरण है, जो पार्टी की कबर खोदने का काम कर रहे है। जिन नेताओं पर जनता विश्वास करती है, जिन्हें जनता सुनना पसंद करती है, वो नेता जो अपने प्रचार से हारी बाजी को जीताने का हुनर रखते है, ऐसे नेताओं की अनदेखी का परिणाम है कि कांग्रेस का अब परंपरागत वोट बैंक ख़तम ही हो गया है। वक्त बदल रहा है और बदलते वक़्त के साथ कांग्रेस ने ना तो अपनी रीति-नीति में और ना ही नेतृत्व में कोई बदलवा किया जिसके चलते आज कांग्रेस विपक्ष में बैठने के लायक भी नहीं बची। जनता बार-बार ये संकेत दे रही है कि कांग्रेस को नेतृत्व में बदलाव की आवश्यकता है, जिस नेतृत्व पर कांग्रेस लगातार दाव खेल रही है वो बार-बार फ़ैल हो रहा है।

केंद्र में हवा पलटते ही कांग्रेस के सारे वरिष्ठ नेता दिल्ली छोड़ कर अपने-अपने राज्यों में आ कर सक्रीय हो गए। जब राष्ट्रिय राजनीति में वरिष्ठ नेताओं के अनुभव की जरुरत है तब सत्ता के लालच में सारे नेतागण मैदान छोड़ कर ही भाग गए। राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत (Ashok Gehlot) विपक्ष में रहते हुए राष्ट्रिय महासचिव के तौर पर पुरे देश में घूमे, उन्होंने कई राज्यों का प्रभार संभाल कर अच्छे परिणाम दिए और इसीलिए उन्हें संगठन महामंत्री बनाया गया। लेकिन राजस्थान में चुनाव का माहौल बनते ही गहलोत प्रदेश लौट आये। लोकसभा चुनाव की घोषणा से पहले वो राहुल गाँधी की टीम छोड़ कर राजस्थान के मुख्यमंत्री बन गए। जिस समय राहुल गाँधी (Rahul Gandhi) और कांग्रेस को गहलोत के अनुभव और ‘जादू’ की दिल्ली में सबसे ज्यादा जरुरत थी, उस समय वो मैदान छोड़ कर भाग खड़े हुए। राजस्थान में सरकार कांग्रेस की बन ही चुकी थी और सचिन पायलट का प्रदर्शन भी शानदार रहा। ऐसे में गहलोत जैसे दिग्गज़ नेता को प्रदेश की राजनीति का हिस्सा बनाना कहाँ की सूझबूझ थी? राजस्थान की सरकार पांच साल के लिए सुरक्षित है, फिर गहलोत के जादू की जयपुर से ज्यादा दिल्ली में जरूरत है।

सिर्फ़ गहलोत ही नहीं कांग्रेस के कई ऐसे वरिष्ठ नेता जो शुरू से ही केंद्र की राजनीति करते आये है वो सभी अपने-अपने राज्यों में सक्रीय हो गए। क्योंकि अपने अनुभव से उन्होंने अंदाज़ा लगा लिया कि फ़िलहाल कांग्रेस की केंद्र में सरकार बनना संभव नहीं है, ऐसे में सत्ता का लालच उन्हें राज्य की राजनीति में घसीट लाया। समय रहते संगठन में बदलाव नहीं कर पाने के कारण आज कांग्रेस इतनी कमज़ोर हो गयी है कि क्षेत्रीय दलों से गठबंधन करने के बावजूद अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पा रही है। उत्तर प्रदेश में सपा को कांग्रेस के साथ गठबंधन करना भारी पड़ा और इसी तरह कांग्रेस के साथ चुनाव लड़ कर तेजस्वी यादव के नेतृत्व में आरजेडी जीती हुयी बाजी हार गयी। बिहार में सबसे अच्छा प्रदर्शन आरजेडी का रहा और तेजस्वी यादव की लहर ने विरोधियों के पसीने छुड़ा दिए। लेकिन कांग्रेस बहुत ही कमज़ोर साबित हुयी और सही से आंकलन करें तो शायद आरजेडी बिना गठबंधन के चुनाव जीत कर बिहार में सरकार बना सकती थी। दिल्ली में आम आदमी पार्टी (AAP) ने अपने ही दम पर भाजपा को बुरी तरह से हराया, तो महाराष्ट्र में शिवसेना ने कांग्रेस के साथ सरकार बनाने के लिए परिणाम आने के बाद गठबंधन किया। लेकिन बिहार की हार के बाद क्या कोई क्षेत्रीय दल कांग्रेस पर भरोसा कर पायेगा? इस हार की जिम्मेदारी कौन लेगा?

लोकसभा चुनाव में हार के बाद राहुल गाँधी ने अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दिया और किसी गैर गाँधी परिवार के कांग्रेसी को मौका देने की इच्छा जाहिर की, लेकिन फिर सोनिया गाँधी (Sonia Gandhi) अंतरिम अध्यक्ष बनी और आज तक वो ही उस सीट पर काबिज़ है। इतना ही नहीं, अब फिर से राहुल गाँधी को अध्यक्ष बनाने की कवायद शुरू हो चुकी है। क्या कांग्रेस जनता को वेवकूफ समझती है? ये जग जाहिर है कि भाजपा का नेतृत्व मोदी-शाह (Amit Shah) की जोड़ी कर रही है लेकिन फिर भी जेपी नड्डा (JP Nadda) को राष्ट्रिय अध्यक्ष बनाया गया। वक़्त की नज़ाकत को समझते हुए भाजपा ने समय समय पर संगठन में बदलाव किये जो वाकई पार्टी के लिए हितकारी साबित हो रहे है। लेकिन राज्यों में धीरे धीरे भाजपा जनता का विश्वास खोती जा रही है। गत वर्षो में विभिन्न राज्यों के विधानसभा परिणामों ने संकेत दे दिए है कि जनता भाजपा का विकल्प ढूंढ रही है। जहाँ भी जनता को बेहतर विकल्प मिल रहा है वहां लोग भाजपा को छोड़ कर दूसरे क्षेत्रीय दलों पर अपने विश्वास की मोहर लगा रहे है। बिहार चुनाव के नतीज़े ना सिर्फ़ कांग्रेस बल्कि भाजपा के लिए भी एक बहुत बड़ा संकेत है कि उन्हें मोदी ब्रांड से निकल कर अब अपने संगठन को राज्यों में मज़बूत करने की आवश्यकता है।

फ़िलहाल भाजपा के प्रत्याशी मोदी (Narendra Modi) के नाम पर वोट बटोर रहे है तो कांग्रेस वाले अपने ही दम पर चुनाव जीत रहे है। कांग्रेस के टिकट पर वो ही प्रत्याशी चुनाव जीत रहे है जिनका खुद का जनाधार बहुत मज़बूत है, जो निर्दलीय भी अपनी सीट निकाल सकते है। फिर आगे चल कर कोई कांग्रेस से टिकट मांगेगा ही क्यों? पार्टी से टिकट की उम्मीद इसलिए होती है क्योंकि पार्टी की विचारधारा में विश्वास रखने वाले परंपरागत वोट प्रत्याशी को मिलते है, लेकिन अब कांग्रेस का वोट बैंक ही खाली हो चूका है। उधर भाजपा की राज्यस्तर पर हालत और ज्यादा नाज़ुक़ होती जा रही है। सांसद का चुनाव मोदी के नाम पर प्रत्याशी आसानी से निकाल लेते है लेकिन विधानसभा के चुनाव में स्थानीय नेताओं पर जनता को विश्वास ही नहीं है और इसीलिए लगातार भाजपा का विधानसभा चुनावो में प्रदर्शन बिगड़ता जा रहा है। जोड़-तोड़ कर सरकार बना लेना कमज़ोर नींव वाले मकान जैसा है जो कभी भी ढेह सकता है और शिवसेना ने महाराष्ट्र में भाजपा को एक बहुत ही जरुरी सबक सिखाया है कि पार्टी को राज्यस्तर पर खुद मज़बूत होना पड़ेगा।

गौरतलब है कि लोकसभा चुनाव में जिस तरह से स्पष्ट बहुमत के साथ भाजपा ने ऐतिहासिक जीत हांसिल की, विधानसभा चुनावों में स्पष्ट बहुमत हांसिल करने में सत्ताधारी पार्टी विफल हो रही है। उधर कांग्रेस की स्थिति चुनाव दर चुनाव बिगड़ती ही जा रही है, लेकिन संगठन में बदलाव ना करने की जिद पार्टी को डुबो रही है। पत्रकार और राजनैतिक विशलेषक भी लगातार कांग्रेस को आगाह कर रहे है कि यदि समय रहते अब कांग्रेस ने जरुरी बदलाव नहीं किये और जनप्रिय नेताओं को अवसर नहीं दिए तो कांग्रेस एक इतिहास बन कर रह जाएगी। कांग्रेस को तो फिर भी सलाह दी जा रही है जिसे नेतृत्व नज़रअंदाज़ कर रहा है लेकिन भाजपा को तो कोई आइना भी नहीं दिखा रहा है। मीडिया और समर्थक विधानसभा चुनावों में भाजपा के लगातार बुरे प्रदर्शन पर पर्दा डालने का काम कर रहे है। हरियाणा के भाजपाई नेता बिहार की जीत का जश्न मना रहे है जो अपने राज्य में हुए उपचुनाव की एक सीट नहीं बचा पाए। हार की समीक्षा ना करना और जोड़-तोड़ की जीत को भव्य समझ कर जश्न मनाना भाजपा के लिए आगे चल कर बहुत भारी पड़ सकता है। कुलमिला कर भाजपा और कांग्रेस दोनों की ही स्थिति बिगड़ती जा रही है जिसे दोनों ही पार्टियां स्वीकार नहीं कर पा रही है।

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